रक्षाबंधन- रक्षा के संकल्प का पर्व

अंजलि ओझा, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश!

रक्षाबंधन- रक्षा के संकल्प का पर्व


रक्षाबंधन हिन्दू धर्म में सम्बन्धों का उल्लास मनाने वाला महापर्व है। श्रावणमास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को रक्षाबंधन का यह महापर्व मनाया जाता है। रक्षाबंधन भाई-बहन के शाश्वत संग का पावन उत्सव बनकर भाई-बहन के सम्बन्ध को सुदृढ़ करता है। प्रति वर्ष हर बहन को प्रतीक्षा रहती है कि कब वह अपने भाई को रक्षासूत्र बांध सकेगी?

रक्षासूत्र बंधन की परम्परा सनातन धर्म के समस्त कर्मकाण्डों का अनिवार्य अंग है। औपरोहित्य कर्म करने वाले आचार्य अपने यज्ञमान(यजमान) के मणिबंध पर कलावा बांधकर रक्षा बंधन की प्रक्रिया पूरी करते हैं। इस रक्षासूत्र बंधन के साथ यज्ञ के आचार्य रक्षामंत्र का वाचन करते हैं, जो कि यथावत है-

ऐन बद्धो: बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबला,
तेनत्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल!

अर्थात् जिस रक्षासूत्र से दानवीर महाबली राजा बलि को बांधा गया था, मैं उसी प्रकार आपको(यजमान) इस रक्षासूत्र से बांध रहा हूँ। यह रक्षा सूत्र आपकी, इस यज्ञ की एवं मेरी रक्षा करेगा।

रक्षाबंधन का कोई ठोस ऐतिहासिक धरातल नहीं है। इससे सम्बन्धित कई कथाएँ, दन्तकथाएँ और लोककथाएँ प्रचलित हैं। सभी कथानकों के मूल में एक बिन्दु है जो कि सार्वभौमिक है, और वह बिन्दु है रक्षा के संकल्प का। यज्ञों में आचार्य अपने यजमान की रक्षार्थ रक्षासूत्र बंधन करते हैं, और वे उसी यज्ञमान से स्वयं की रक्षा एवं यज्ञ की यथाविधि पूर्ण करवाने का संकल्प भी लेते हैं। अस्तु रक्षाबंधन की उपपत्ति ही साझे संकल्प की डोर से बुनी गई है। कथाओं के सिन्धु में तिरती अनेक कथाओं में से सबसे अधिक कही-सुनी जाने वाली कथाओं में से दो कथाएँ हैं- पहली कथा राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी है तो दूसरी कथा भगवान श्रीकृष्ण और उनकी सखी द्रौपदी के

दोनों कथाओं का संक्षिप्त वर्णन करना आवश्यक है, जिससे हमारी वर्तमान पीढ़ी और आने वाली संततियों को अपनी संस्कृति के प्रति गौरव बोध का भाव‌ बनाए रखा जा सके।

पहली कथा इस प्रकार है कि एक बार भगवान नारायण के परम भक्त प्रह्लाद के पौत्र दानवीर राजा बलि दानयज्ञ कर रहे थे। उनके समक्ष जाकर कोई भी निराश न लौटता था। तब श्रीनारायण ने राजा बलि की दानशीलता की परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने अपने शरीर को ठिगना रूप दे दिया, जिसे वैष्णव भक्त श्रीवामन अवतार के रूप में पूजते हैं। वामन महाराज राजा बलि के पास पहुंचे और उन्होंने राजा बलि से दान लेने की इच्छा प्रकट की। राजा बलि को अपनी दानशीलता का अहंकार था, उसने भगवान वामन को बिना किसी विचार के कुछ भी माँग लेने को कहा। वामन भगवान ने तीन पग भूमि मांगी। बलि को यह एक वामन ब्राह्मण का उपहास लगा और उसने वामन भगवान को तीन पग भूमि माप लेने को कहा। तभी श्रीनारायण ने अपने वामन रूप का विराट स्वरूप प्रकट किया और एक पग में पूरी पृथ्वी माप डाली, दूसरा पग में आकाश में रखा और जब तीसरे पग को रखने का स्थान न‌ शेष रहा तब राजा बलि ने उनसे प्रार्थना की कि वे अपना तीसरा पग उसके मस्तक पर रखें। उसकी विनती सुनकर विराट वामन पुरुष ने बलि के मस्तक पर अपना पग रखा, और पग रखते ही राजा बलि पाताल लोक तक धंसता चला गया। बलि ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उसके साथ पाताल लोक में निवास करें। भक्त वत्सल भगवान विष्णु पाताल में निवास करने लगे। उस ओर जब देवी लक्ष्मी को यह घटना ज्ञात हुई तो उन्होंने श्रीविष्णु को वापस ले आने के लिए राजा बलि को एक सूत्र बांधकर संकल्पबद्ध किया, इसके प्रत्युपहार में बलि ने माता लक्ष्मी के भगवान विष्णु को क्षीरसागर ले जाने की इच्छा पूर्ण की। कहते हैं वह तिथि श्रावण शुक्ल पूर्णिमा ही थी, तब से सभी बहनें अपने भाइयों को‌ रक्षा बांधती हैं, और अपनी इच्छाओं के पूर्ण ‌होने की कामना भी रखती है।

इस कथा के उपरांत श्रीकृष्ण और याज्ञसेनी द्रौपदी के सखा धर्म के निर्वहन की दूसरी अति करुण कथा आती है। द्रौपदी और श्रीकृष्ण यूँ तो सम्बंधी थे, चूंकि देवी कुन्ती श्रीकृष्ण की बुआ थीं और द्रौपदी कुन्ती की वधू। किन्तु श्रीकृष्ण और द्रौपदी इस नातेदारी के सम्बंध से परे एक और सम्बन्ध से बंधे थे, जो कि संसार में सर्वथा निश्छल, नि:स्वार्थ रिश्ते की श्रेणी में आता है और वह है मित्रता! द्रौपदी श्रीकृष्ण की परम सखी थीं। कृष्ण ने यों भी सम्बंधों के लिए अपने जाने कितने संकल्प तोड़े हैं, जाने कितने नियमों को भंग किया है। फ़िर द्रौपदी तो उनकी सखी थीं। कथा कुछ यों आती है कि जब युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शिशुपाल श्रीकृष्ण को भरी सभा में गालियाँ दे रहा था तब अपने बुआ को दिए संकल्प के अनुसार उसकी सौ गालियों तक वे मौन रहे। किन्तु शिशुपाल नहीं रुका और उसके इस घृणित कृत्य के लिए कृष्ण ने सुदर्शन चक्र का आवाह्न किया और शिशुपाल का वध कर दिया। शिशुपाल का वध करके सुदर्श‌न चक्र पुनः श्रीकृष्ण की तर्जनी ऊंगली पर वापस लौट आया।‌पूरी सभा शिशुपाल का वधित शरीर देख रही थी किन्तु द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की कटी ऊंगली और उससे निकलता रक्त देखा। द्रौपदी को अपार पीड़ा हुई। वे भागी-भागी अपने सखा के पाऊं पहुंचीं और अपने चीर का टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली में बांध दिया। तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया कि “मैं इस चीर के एक-एक तंतु का मूल्य चुकाऊँगा।” अपने वचन का पालन करते हुए उन्होंने दुर्योधन के दरबार में नग्न की जाती द्रौपदी के सम्मान की रक्षा की और उस एक छोटे से चीर का उपकार उन्होंने द्रौपदी के शरीर को चीर के अम्बार से ढककर चुकाया। तमाम ज्ञानी मानी, पितामहों, आचार्यों के समक्ष एक स्त्री को नग्न करने के दुस्साहस को कन्हैया नहीं सह सके और द्रौपदी को उस क्षण केवल अपने सखा की याद आई और उनके सखा ने अपनी सखी की लाज भी रखी। तभी से रक्षा की यह परम्परा भाई-बहन के मध्य मनाई जाने लगी।

किसी अज्ञात कुलशील की कलम से चंद पंक्तियां फूट पड़ीं कि,

तोता के पढ़ावन में गणिका ने बांध लियो,
बांध लियो कुंजर ने प्रेम की पुकारों में,
माखन के चार में गोपियों ने बांध लियो,
छछिया भर छाछ पे नाचे ब्रजनारों में,
मुट्ठी भर चावल में सुदामा ने बांध लियो,
द्रौपदी ने बांध लियो कच्चे सूत तारों में!

और इस प्रकार संस्कारों से समृद्ध सनातन संस्कृति को एक और दिन मिल गया जिससे वे अपने सम्बन्धों के प्रति अपना समर्पण प्रकट कर सकें। आज का दिन हर घर हर्षोल्लास भरा रहता है। विवाहिता बहनें अपने ससुराल से मायके की ओर चल देती हैं, अपने भाई को हर विपत्ति से बचाने का मनोरथ लिए दो धागे के रक्षा कवच से आबद्ध करती हैं। यह दिन हर भाई को भाई होने के दायित्वों का बोध करता है। बहन को गर्व होता है अपने भाई पर और उनके हृदय में एक दृढ़ता होती है जो कहती है, “भईया हैं ना!” जो उसकी हर कठिनाई से, हर आततायी से रक्षा करेगा। आज के समय मेंइस त्योहार की उपयोगिता और भी बढ़ गई है, क्योंकि हर बहन-बेटी को एक रक्षक की आवश्यकता है। समाज में दिनों-दिन स्त्रियों के ऊपर जिस तरह अन्याय और कुदृष्टि बढ़ रही है। ऐसे में हर पुरुष को हर एक स्त्री की अस्मिता की रक्षा का संकल्प लेना ही होगा। अन्यथा जाने कितनी द्रौपदियों का चीरहरण होता रहेगा और उनका कृष्ण से विश्वास उठ जाएगा। सभी पुरुषों सभी भाइयों से निवेदन करती हूँ कि दुर्योधन मत बनिए, कृष्ण की परम्परा को निभाइए। एक सूत्र के बदले आजीवन रक्षा का संकल्प लेकर अपनी बहनों को निडर बनाइए।

आप सभी को इस शुभ पर्व की शुभकामनाएँ!