*बहनजी के किले में दरार: जिसके इशारे पर सत्ता कांपती थी, आज परिवार ही नहीं सुन रहा*लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक दौर था जब एक आवाज पर लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सियासत कांपती थी। अफसरों की सांसें थम जाती थीं, मंत्रियों की कुर्सियां हिल जाती थीं और नीला झंडा हाथ में लिए लाखों कार्यकर्ता सड़क पर उतर आते थे। वह आवाज थी बहनजी मायावती की।लेकिन आज वही मायावती अपने परिवार, अपनी सुरक्षा और अपनी देखभाल की चिंताओं को लेकर सार्वजनिक रूप से लिखने को मजबूर हैं। सोशल मीडिया पर आया उनका भावुक संदेश सिर्फ एक पोस्ट नहीं, बल्कि बसपा के विशाल किले में आई दरार की सबसे बड़ी गवाही है।कांशीराम का आंदोलन, मायावती की सत्ता1984 में मान्यवर कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी। नारा था – जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। इस आंदोलन को सत्ता की मंजिल तक पहुंचाया मायावती ने। 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री, 2007 में 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर उन्होंने इतिहास रच दिया।लेकिन 2012 के बाद कहानी बदली। 2014, 2019, 2022 और 2024 के चुनावों में हाथी की चाल लगातार धीमी होती गई और बसपा हाशिए पर चली गई।उत्तराधिकार की लड़ाई बनी अकेलेपन की वजह?मायावती के अकेले पड़ने की सबसे बड़ी वजह पार्टी में उत्तराधिकार को लेकर चल रहा घमासान बताया जा रहा है।पहले भतीजे आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाकर उत्तराधिकारी के तौर पर पेश किया गया, फिर अचानक उन्हें सभी पदों से हटा दिया गया। उसके बाद ईशान आनंद के नाम की चर्चा तेज हुई और अब दीपिका आनंद का नाम सामने आ रहा है।सवाल उठ रहा है कि जिस पार्टी को कांशीराम ने कैडर और मिशन के आधार पर खड़ा किया था, उसमें उत्तराधिकारी परिवार से ही क्यों तलाशा जा रहा है? इसी उलझन ने किले में दरार पैदा कर दी है।जिनके इशारे पर IAS-IPS कांपते थे, आज वही चिंतित हैंराजनीति के जानकारों का कहना है कि यह तस्वीर बेहद चौंकाने वाली है। जिस नेता के एक इशारे पर बड़े-बड़े मंत्री, नेता और IAS-IPS अधिकारी कांपते थे, आज उन्हीं को अपनी निजी सुरक्षा और देखभाल के लिए सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखनी पड़ रही है।यह सिर्फ एक नेता के अकेलेपन की कहानी नहीं है, बल्कि उस बहुजन आंदोलन के भविष्य का सवाल भी है, जिसने कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर राज किया था !!