*संसद में यही सवाल उठेगा—हजारों करोड़ खर्च हुए, आपात की ट्रॉली सांसद क्यों लाए?*लखनऊ/ रायबरेली में राहुल गांधी ने जो हरी झंडी दिखाई, वह अब सिर्फ जोन की नाकामी नहीं रह गई। वह प्रदेश की भाजपा सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार दोनों के लिए संसद का कठिन सवाल बन सकती है। नौ सितंबर दो हजार छब्बीस को लोकसभा में विपक्ष के नेता और रायबरेली सांसद राहुल गांधी ने सांसद निधि से दो चलित ट्रांसफार्मर—करीब इक्कीस लाख रुपये—और दो रोगी वाहन सौंपे। खरीद विभाग के जरिए हुई। मशीन विभाग के सामने खड़ी रही। कैमरा विपक्ष के पास चला गया। संदेश यही गया कि सरकार नहीं दे सकी, सांसद को अपनी निधि से करनी पड़ी। अगर राहुल गांधी यही दृश्य संसद में रख दें, तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ या ऊर्जा मंत्री ए. के. शर्मा क्या जवाब देंगे? कि हजारों करोड़ की योजनाओं के बावजूद आपात काल की समुचित व्यवस्था नहीं थी?यह सवाल तीखा इसलिए है क्योंकि चलित ट्रॉली वाला ट्रांसफार्मर आपात के लिए होता है और इसे विभाग स्वयं खरीदता है। जला ट्रांसफार्मर आने तक गांव की रोशनी बचाने की मशीन है। कार्य योजना में इसके लिए राशि निकलती है। भंडार में इसके लिए मांग लगती है। यह सांसद का खिलौना नहीं, वितरण निगम का औजार है। रायबरेली जोन के मुख्य अभियंता को यह मालूम था। मालूम होने के बाद भी आपात की ट्रॉली सांसद निधि की झंडी बन गई। पहली गलती यही है। विभाग खरीदता है—यह मूल नियम भूल गए, तो विपक्ष को मंच मिल गया।अब कल्पना कीजिए संसद का दृश्य। नेता प्रतिपक्ष पूछें—पुनर्गठन और सुधार की योजनाओं पर करोड़ों खर्च हुए, फिर रायबरेली में आपात ट्रॉली उनके कार्यालय से क्यों नहीं आई? सांसद निधि से क्यों आईं? ऊर्जा मंत्री कहेंगे कि मशीन विभाग ने भी खरीदी है, भंडार में मांग लगी थी, कार्य योजना स्वीकृत थी। तब दूसरा सवाल और तेज होगा—अगर विभाग खरीदता है, भंडार है, योजना है, तो हरी झंडी सांसद के हाथ में क्यों थी? मुख्यमंत्री कहेंगे कि एक-दो मशीन से पूरी व्यवस्था नहीं नापी जाती। तब तीसरा सवाल आएगा—व्यवस्था नापने की बात छोड़िए, आपात की ट्रॉली तो रोजमर्रा का औजार है। वह भी सांसद निधि से आ जाए, तो हजारों करोड़ की योजनाओं का दावा संसद में कैसे टिकेगा? केंद्र की सरकार पर भी वही छींटा पड़ेगा। वितरण सुधार की राष्ट्रीय योजनाएं केंद्र से चलती हैं। राज्य उन्हें मैदान में लागू करता है। दोनों के बीच खाली जगह को राहुल गांधी अपनी निधि से भरते दिखें, तो भाजपा की दोनों सरकारों की छवि एक साथ कटती है।यहीं मुख्य अभियंता की दूसरी गलती खुलती है। रायबरेली में ट्रांसफार्मर जलना, तार टूटना, गर्मी में गांवों का अंधेरा दर्ज शिकायतें हैं। सलोन की कटौती पर विधायक प्रबंध निदेशक तक गए। जिलाधिकारी ने क्षतिग्रस्त मशीन समय पर बदलने को कहा। विभाग ने खुद लिखा कि ट्रांसफार्मर कार्य योजना में स्वीकृत है, भंडार में मांग लगी है। फिर भी मुख्य अभियंता ने न अपनी योजना से पहले मशीन लगाई, न ऐलान होते ही फाइल मंत्री तक पहुंचाई। अगर जोन ने आपात के लिए राशि पहले ले ली थी, तो दोहरी व्यवस्था क्यों? एक राशि दफ्तर में, दूसरी मंच पर? अगर राशि नहीं ली थी, तो भंडार खाली क्यों रहा? दोनों हाल में जवाब लखनऊ के पास नहीं, जोन के पास अटकता है। संसद में यही अटकना सरकार का जवाब बन जाएगा।इसी बीच वह खबर आती है, जिसे दफ्तर दबाना चाहता है। पद-विस्तारण।प्रबंध निदेशक रिया केजरीवाल ने आदेश दिया था—गृहजनपद में तैनाती मना है। मकसद था अपने घर-जिले का गढ़ तोड़ना। आरोप है कि रायबरेली जोन के मुख्य अभियंता उसी आदेश को ताक पर रखकर अपने लोगों का पद बढ़ा रहे हैं, उन्हें पसंदीदा जगह बैठा रहे हैं और कठिन क्षेत्र से बचाए रख रहे हैं। नवंबर दो हजार पच्चीस की समीक्षा के बाद जोन के दोनों अधीक्षण अभियंता हटे भी थे। सख्ती ऊपर दिखी। नीचे खेल नहीं थमा। जो कुर्सी आपात भंडार देखने के लिए थी, वह कुर्सी बढ़ाने के काम आ गई। गृहजनपद पर रोक कागज पर रही। पद-विस्तारण मैदान में चला। तीसरी गलती यही है—आदेश की अवहेलना। आपात की फाइल पीछे रही, अपने लोगों की फाइल आगे रही। तभी राहुल गांधी को वह मंच मिला, जो विभाग का होना चाहिए था। संसद में अगर यही जोड़ दिया जाए—आपात की ट्रॉली विभाग खरीदता है, फिर भी सांसद लाए, क्योंकि मुख्य अभियंता पद बढ़ाने में व्यस्त थे—तो छीछालेदर और गहरी होगी।दस सितंबर को सोशल माध्यम पर वही दृश्य व्यंग्य बन चुका है। माला लिपटा ट्रांसफार्मर, नीली जाली, ट्रैक्टर पर हरी झंडी। साथ तुलना—किसी के यहां ट्रांसफार्मर का लोकार्पण, किसी के यहां हवाई अड्डा, द्रुतमार्ग और वंदे भारत। संदेश था कि दोनों एक जैसे नहीं। वीडियो घूमा। अब वही बारह सेकंड संसद की बेंच पर भी चल सकते हैं। तब केंद्र कहेगा बड़ी परियोजनाएं हमने दीं। प्रदेश कहेगा आपूर्ति सुधरी है। विपक्ष एक तस्वीर दिखाएगा—आपात की ट्रॉली पर राहुल गांधी की हरी झंडी। बड़ी परियोजना का जवाब छोटी मशीन से कट जाएगा। यही राजनीतिक गणित मुख्य अभियंता की गलती ने सरकार के गले पहना दिया है।सांसद निधि से सामुदायिक संपत्ति देना अवैध नहीं। सवाल वैधता का नहीं, जवाब का है। संसद में पूछा जाएगा—हजारों करोड़ की योजनाओं के बावजूद आपात काल की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं दिखी? राहुल गांधी को अपनी सांसद निधि से क्यों करनी पड़ी? ऊर्जा मंत्री ए. के. शर्मा और अपर मुख्य सचिव ऊर्जा तथा विद्युत निगम के अध्यक्ष डॉक्टर आशीष कुमार गोयल के पास तभी जवाब होगा, जब कागजात खुलेंगे। रायबरेली जोन में इस वर्ष आपात ट्रॉली के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई? विभाग ने कितनी मशीनें स्वयं खरीदीं? कितनी भंडार में पड़ी रहीं, कितनी गांव गईं? सांसद निधि की मशीनें किस आदेश से खरीदी गईं? गृहजनपद पर रोक के बाद कितने पद बढ़ाए गए? मुख्य अभियंता ने ऐलान के कितने दिन पहले लिखित चेतावनी भेजी?अगर ये उत्तर तैयार नहीं हैं, तो संसद में मुख्यमंत्री या ऊर्जा मंत्री के पास एक ही वाक्य बचेगा—विभाग खरीदता है, व्यवस्था है। विपक्ष उसी वाक्य पर हरी झंडी की तस्वीर रख देगा। तब अनुभवहीनता और पद-विस्तारण की कीमत सिर्फ एक अधिकारी नहीं चुकाएगा। प्रदेश की सरकार और केंद्र की सरकार दोनों चुकाएंगी। मंत्री जी और अध्यक्ष महोदय पहले लिख दें—रायबरेली जोन के मुख्य अभियंता को दंडित किया जाए या इनाम दिया जाए? देर हुई, तो इक्कीस लाख की मशीन का सवाल हजारों करोड़ की योजनाओं से भारी पड़ जाएगा। आपात की ट्रॉली विभाग खरीदता है। यह वाक्य भूलने की सजा संसद में मिलेगी। खैर *युद्ध अभी शेष है।