आत्महत्याओ की घटनाएं रुकना जरूरी – प्रो. नंद लाल मिश्रा

आत्महत्याओ की घटनाएं रुकना जरूरी – प्रो नंद लाल मिश्रा

चित्रकूट, 31अगस्त 2021। प्रिंट मीडिया ,इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया नेटवर्क में आत्महत्याओ को प्रदर्शित करने का काम लगभग प्रत्येक दिन किया जा रहा है ।कभी यहां तो कभी वहां। यह समाज के लिए बेहद चिन्तनीय है।ये आत्महत्याएं ऐसे हो रही हैं जैसे कोई खेल की प्रतिस्पर्धा चल रही हो।इन आत्म हत्याओं में हर उम्र वर्ग के लोग सम्मिलित हैं,हर पेशे के लोग शामिल हैं,हर धर्म के लोग और हर जाति के व्यक्ति हैं।ये विभिन्न रूपों में देखने को मिलती है।कोई पंखे से झूलकर तो कोई पेड़ से लटक कर कोई रिवॉल्वर या बंदूक से तो कोई विष खाकर।कोई नदी में कूदकर तो कोई ट्रेन के सामने आकर अपनी जान गवां बैठता है।

समाज बदल रहा है।समय भी बदल रहा है,लोग बदल गए और उनकी नैतिकता भी बंधक बन चुकी है।ऐसे में समाज के बीच बहुत सोच विचारकर आगे बढ़ना है।इसी समाज मे ऐसे लोग भी हैं जो इन परिवर्तनों या दबाओं को सहज रूप से झेल नही पाते और अपनी इह लीला समाप्त करने में ही अपनी भलाई समझ लेते हैं।लेकिन दुनिया तो दबावों का बसेरा है और इन दबावों को सहजता से झेल ले जाना ही तो जिंदगी है।लेकिन यह सब कहना और लिखना तो आसान है,व्यक्ति जब अपनी मनोदशा के उस चरम पर पहुँच जाता है जहाँ उसे उसकी मौत भी उसे पीछे नही डिगा सकती तो वह इस तरह का कदम उठा लेता है।
अब हमें यह समझने की जरूरत है कि इस तरह की विकृति में बेतहाशा वृद्धि क्यो हो रही है।लोग अपने जीवन की कीमत इतना कम क्यों आँकने लगे है।लोग इस तरह की मानसिक दुर्बलता के शिकार क्यों हो रहे हैं?इसका उत्तर भी आपको चौका सकता है।समाज ही इसका जिम्मेदार है।समाज की व्यवस्था और समाज के मानक समाज मे इस कदर के दबाव का निर्माण अंदर ही अंदर किये होते है कि कमजोर व्यक्ति इसका मुकाबला ठीक ढंग से कर नही पाता और वह गलत रास्ते का चुनाव कर बैठता है।

कारणों को ठीक ढंग से यदि समझें तो यह बात सामने आएगी कि एक लड़की का यौन शोषण होता है और शोषक कौन है किसी पार्टी का नेता।लड़की बार बार फरियाद करती है लेकिन कहीं पर उसकी सुनवाई नही होती।अधिकारी जज और नेता मिलकर उस केस को आगे नही बढ़ने देते।मजबूरन उसे सुप्रीम कोर्ट के सामने आत्महत्या करनी पड़ती है।केस को ठीक ढंग से प्रस्तुत न कर पाने के कारण एक आई पी एस को पुलिस बिना किसी वारंट के जबरी बकरे की तरह गाड़ी में ठूसकर हवालात पहुचाती है बाद में न्यायिक हिरासत में भेज देती है।एक आत्म हत्या सुप्रीम कोर्ट के सामने लड़की ने की और दूसरी आत्म हत्या कराने की तैयारी व्यवस्था कर रही है।उस आई पी एस को जबरी रिटायर कर दिया जाता है और अब न्यायिक हिरासत में।ये आत्म हत्याओं का सिलसिला है।यह तो एक स्वरूप है।

आईये और रूप देखें।एक किसान,मजदूर साहूकारों और बैंकों से ऋण लेता है।पर समय पर भरने के लिए उसके पास पूंजी नही हो पाती।लिहाजा वह बढ़कर बोझ बन जाता है।अपने को लौटाने में असमर्थ पाता देख वह आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है।

आजकल लव मैरिज का भूत लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है।ऐसे में लड़के और लड़कियां न तो अपने परिवार की इज्जत और प्रतिष्ठा को देख पाते हैं न इसको कोई महत्व देते हैं।नेट पर प्रेम परवान चढ़ता है और बिना शादी व्याह किये ही शारीरिक संबंध बनने शुरू हो जाते हैं।जब यह बात घर परिवार वालों को पता चलती है तब तक बहुत देर हो जाती है।बहुत से लड़के शारीरिक संबंध बनाने के बाद शादी से मुकर जाते हैं।ऐसे में मामले थाने तक और कोर्ट में पहुँच जाते हैं और रेप के आरोप प्रत्यारोप चलते हैं।अंततः इसमे से नब्बे प्रतिशत मामले आत्महत्या में तब्दील हो जाते हैं।माँ-बाप की थोड़ी लापरवाही और बच्चों का दुलार प्यार उनके गले की हड्डी बन जाता है।बच्चे उन्हें कहीं का नही छोड़ते।दहेज नामक बला भी इसमें एक महत्वपूर्ण कारक है।दहेज से बचने के लिए भी इस शार्ट कट को आजमाया जाता है।क्योंकि दहेज समाज मे अभिशाप है।बिना दान दहेज लिए कोई भी शादी के लिए तैयार नही होता।शादी के बाद भी दहेज की प्रताड़ना दी जाती है जिसका परिणाम या तो तलाक होता है या हत्या या फिर आत्महत्या।

अपने देश मे नशीले पदार्थों का प्रचलन और व्यापार दोनो बढ़ा है।घर परिवार के बिगड़ैल लोग नशे की हालत में किसी का भी रेप कर देते हैं।उन्हें यह समझ ही नही आता कि जिसका रेप वे कर रहे हैं वह बालिंग है या नाबालिक या वृद्धा।इनमे से कई शिकार हुए लोग आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा देते हैं।

आवश्यकता है ऐसे कमजोर लोगों की पहचान करना जो तनिक सी विपरीत परिस्थिति आने पर गलत कदम उठा लेते है।उन्हें अपनी नजरों के सामने रखकर उनको बहुत प्यार और आत्मविश्वास के साथ समझाने का कार्य करना चाहिए।बहुत से परिवार के मुखिया ही इस तरह के कदम उठा लेते है।ऐसे में परिवार के समस्त सदस्यों की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसी दशा को भांपकर समय समय पर विश्वास भरें और कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करने की प्रेरणा दे।

इस तरफ समाज का ध्यान बहुत जरूरी है।सरकारों को भी इस तरह के आंकड़ों को इकट्ठा कराकर इसका विश्लेषण कराना आवश्यक प्रतीत होता है।समय रहते इस पर विचार नही किया गया तो यह वीमारी घर घर अपना पावँ जमा लेगी।इससे छुटकारा पाना असंभव हो जाएगा।

प्रो नंदलाल मिश्र
अधिष्ठाता कला संकाय
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय
विश्वविद्यालय चित्रकूट सतना म.प्र.

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